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Opinion: यादें 1947 की- दिल्ली में जलती इंसानियत की मशालें
मनोज कुमार जब भी दिल्ली आते, एक अजीब-सी बेचैनी उनके अंदर उठती. सिविल लाइंस के उन दो स्थानों से गुजरना उनके लिए सिर्फ रास्ता तय करना नहीं होता था—यह एक चुपचाप अदा की जाने वाली नजर थी. दिल्ली ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल. दोनों जगहें उनके जीवन की उस अंधेरी रात की याद दिलाती थीं, जब सब कुछ छूट गया था और कुछ भी बाकी नहीं बचा था.

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